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तंत्र और हमारा शरीर
जून 9, 2007

आमतौर पर हमलोग तंत्र का मतलब समझते हैं-जादू-टोना और अंधविश्वास और तात्रिक का मतलब होता है-टोना-टोटका करनेवाला, काले कपड़ों में लिपटा हुआ आदमी. इस समझ ने तंत्र विद्या को पर्याप्त नुकसान पहुंचाया है. मैं खुद तंत्र को इसी नजरिये से देखता था. लेकिन जैसे-जैसे यह विद्या मैं समझने लगा, मुझे बहुत अफसोस हुआ कि ऐसी परम विद्या के बारे में मैं कैसी मूर्खतापूर्ण धारणा लेकर जी रहा था. तंत्र  शरीर विज्ञान को समझने का वैज्ञानिक माध्यम है. इसमें जो भी प्रयोग होते हैं वे शरीर की मर्यादा को उच्चतर अवस्था में समझने के लिए किये जाते हैं. लेकिन लंबे समय से चली आ रही पश्चिमी सोच-समझ के प्रभाव के कारण हम भी तंत्र के बारे में वैसा ही नजरिया रखते हैं जैसा कि पश्चिमी लोगों ने हमें सिखा दिया.

आज क्या हम किसी वैज्ञानिक और डॉक्टर पर अंगुली उठा सकते हैं? क्या हम उसको कह सकते हैं कि तुम इन कांच और प्लास्टिक की नलियों के साथ जो खिलवाड़ कर रहे हो वह सब ढोंग-ढकोसला है. आज हम नहीं कह सकते. लेकिन हो सकता है हजार-पांच सौ साल बाद जब यह विद्या लुप्त होकर केवल कुछ लोगों के पास बचे और हम उनको इस तरह से अनुसंधान करते हुए देखें तो? तब हम यह नहीं कहेंगे कि तुम वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हो. तब शायद हम ही इन विषयों को ढोंग-ढकोसला कहकर खारिज कर दें. आज हम जिसे विज्ञान मान रहे हैं वह हमारी समझ के दायरे में आता है, जिसे हम ढोंग कह रहे हैं हो सकता है वह ज्ञान हमारी समझ के दायरे के बाहर चला गया हो? समय-समय पर इस तरह की परिस्थितियां बनती रहती हैं.

तंत्र का मैंने जितना अध्ययन किया है उसमें न उसके प्रयोगों से मुझे कोई आपत्ति है और न उनके उद्येश्यों से. मैं यह तो नहीं कह सकता कि मैं तंत्र समझता हूं लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि यह एक कल्याणकारी विद्या है जिसका कुछ स्वार्थी लोगों ने गलत इस्तेमाल किया है और उसी को तंत्र के रूप में प्रचारित किया है. अगर कोई झोलाछाप डॉक्टर अपनी नादानी में किसी मरीज की जान ले ले तो क्या हम एलोपैथी को ही बुरा मान लेंगे?

तंत्र मनुष्य शरीर और मन को समझने का एकमात्र वैज्ञानिक रास्ता है. आज जिस विज्ञान के जरिए हम शरीर शास्त्र की व्याख्या करते हैं उसकी पहुंच सीमित है. शरीर के स्थूल अंगों से आगे न तो उसकी समझ काम करती है और न ही उसके औजारों की कोई पहुंच है. विज्ञान केवल कुछ ही उपकरण ऐसे बना सका है जो शरीर से आगे जाकर मेजरमेन्ट कर सकते हैं. इससे अधिक वे उपकरण कुछ नहीं कर सकते. मष्तिष्क से निकलनेवाली उर्जा तरंगों को नाप सकने के औजार विज्ञान के पास हैं लेकिन इन तरंगो के परिवर्तन करा सकने की क्षमता न विज्ञान में है और न वैज्ञानिकों में. रोग होने पर उसको माप लेना भला कोई उपलब्धि है क्या? आज का विज्ञान टूट-फूट पर चुनाई का काम करता है. मानव शरीर विज्ञान के बारे में तंत्र इससे बहुत आगे जाता है.

मनुष्य के पांच प्रकार के शरीर होते हैं.

1. अन्नमय कोश

2. प्राणमय कोश

3. मनोमय कोश

4. विज्ञानमय कोश

5. आनंदमय कोश

1. अन्नमय कोश शरीर पंचतत्व से मिलकर बना है. ये पांच तत्व हैं—पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु. मनुष्य ही नहीं सभी जीवात्मा इन्हीं पांच तत्वों के संयोग से बनते हैं और जीवनभर इन्हीं पांच तत्वों पर निर्भर रहते हैं. क्या मनुष्य और क्या पशु और क्या वनस्पतियां. यहां एक सवाल आता है कि अगर सभी जीव इन्हीं पांच तत्वों से मिलकर बने हैं तो फिर क्या हम एक दूसरे का भक्षण कर जीवित हैं. सीधे तौर पर कहें तो हां, लेकिन आप इतने सीधे तौर पर समझ नहीं सकते. इसी सीधी समझ का नतीजा है कि तांत्रिक के मांसाहार भक्षण विधि का खूब जमकर दुरूपयोग होता है. खुद शराब पीनी है और मांसाहार करना है और नाम लेते हैं तंत्र का. तंत्र में इस तरह के प्रयोग होते हैं और इसलिए होते हैं कि पदार्थ भेद समाप्त हो जाए. हमारे मन में जब तक पदार्थ भेद बना रहेगा तब तक हमारी मुक्ति संभव नहीं है. तंत्र में इस तरह के प्रयोग होते ही इसलिए हैं कि आपके मन में पदार्थ भेद समाप्त हो जाएं. नहीं तो जीवन-भर हम इसी में अटके रहते हैं कि यह नहीं करना है, यह करना है. इसे पाना है और इसे बिल्कुल हाथ नहीं लगाना है. हमारी यह सोच पदार्थ भेद के कारण है. अगर आप शाकाहारी हैं तो भी आप इन्हीं पंच तत्वों का सेवन कर रहे हैं और अगर आप मांसाहार करते हैं तो भी आप इन्हीं पांच तत्वों का सेवन कर रहे हैं. इस तरह के प्रयोग बहुत सात्विक और निर्मल मन से करना चाहिए नहीं तो वे विकार के रूप में हमारे मन में घर कर जाते हैं.

श्मशान में मनुष्य की चिता से उसकी अधजली लाश को खाकर साधना करनेवालों के बारे में आपने सुना होगा. ये तंत्र के कोई सैद्धांतिक प्रयोग नहीं हैं. तंत्र साधकों में हो सकता है किसी ने यह प्रयोग किया हो अपने उन्मुक्त मन को मारने के लिए. लेकिन आज   बहुत से ऐसे तांत्रिक हैं जो सिद्ध हैं लेकिन मरे हुए मनुष्य शरीर का मांस खाना उनके लिए रोग हो गया है. अब ऐसे लोगों को क्या कहें? वे उसी तरह से मानसिक रोगी हैं जैसे कोई पागलखाने का पागल. उनके पास गहन विद्या है. लेकिन एक रोग ऐसा लग गया कि श्मशान छूटता नहीं.  मैं यह सब लिखना नहीं चाहता हूं लेकिन तंत्र का ऐसे लोगों की वजह से बहुत नुकसान हुआ है. अन्नमय कोश के पांच तत्वों का भेद बिना किसी अभद्र प्रयोग के हमारे समझ में आ जाता है तो इस तरह के प्रयोगों से बचना चाहिए. श्माशान साधना का एक कारण है जीवन की नश्वरता को समझ लेना. यह आप बिना श्मशान गये भी समझ सकते हैं.

जीव का अन्नमय कोश नाड़ी समूहों से संचालित होता है. नाड़ियों के इन समूहों में दो तरह की नाड़ियां होती हैं. इन्हीं के माध्यम से शरीर में प्राण का संचरण होता है. 

2. प्राणमय कोशः यह मनुष्य का सूक्ष्म शरीर है जो उर्जा से निर्मित है. प्राण का केन्द्र नाभि है. शरीर में पांच प्रकार के प्राण है जो वायु के रूप में शरीर में संचरण करते हैं. अपान, उदान, समान, व्यान और प्राण.  इनमें से किसी के एक के कमजोर पड़ जाने पर शरीर में रोग उभरते हैं.

3. मनोमय कोशः मनोमय कोश की स्थापना मन, बुद्धि और चेतना से मिलकर बनता है.

4. विज्ञानमय कोशः इसको स्पष्ट रूप से व्याख्या करना थोड़ा मुश्किल है. क्योंकि विज्ञानमय कोश को समझने के लिए थोड़ा ध्यान का अभ्यास जरूरी है. जो लोग ईश्वर उपासना करते हैं या फिर कोई ऐसा कार्य करते हैं जो मिशनभाव से किया जाता है उनको इसका मर्म आसानी से समझ में आ सकता है. क्योंकि ऐसे लोग श्रद्धा और समर्पण की ताकत जानते हैं जिसके कारण हमारी बुद्धि एक ऐसी शुद्ध अवस्था में पहुंच जाती है जहां तर्क और विरोधाभास समाप्त हो जाते हैं.

यह शरीर का वह स्वरूप है जहां पदार्थ के मूल तत्व के रूप में आप उपस्थित हैं. न रूप, न रंग, न आकार फिर आपके होने का पक्का प्रमाण. यह रसायन भाव है. ध्यान में कई बार इस अवस्था का आभास अपनेआप होता है. लेकिन यह होता क्षणिक है. आपको पुनः भौतिक अनुभूतियों में वापस आना होता है. यह अवस्था अगले चरण में समाप्त हो जाती है. इस शरीर में बार-बार जाया जा सकता है.

आनन्दमय कोशः इसका कोई अनुभव अभी तक मुझे नहीं हुआ है. फिर भी मैं इसके बारे में सिर्फ इतना कह सकता हूं कि यह कोई ऐसी अवस्था है जहां से वापस आना संभव नहीं है.  एक बार गये तो गये………जय सियाराम