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मौन क्या है?
फ़रवरी 14, 2012

अब जरा सुनिये. वही सवाल जो आपके मन में है. बार बार कथा कहानियों में प्रवचनों में सत्संग में बताया जाता है कि मौन रहना चाहिए. साधना विधियां भी ऐसी ऐसी कि महीने महीने भर का मौर रखवाया जाता है. जो मौन धरते हैं वे जानते हैं कि मौन क्या है लेकिन जो नहीं धरते उनके मन में मौन को लेकर हमेशा आशंका रहती है. जीव की मूल प्रकृति अभिव्यक्ति मूलक है अगर वह अभिव्यक्त होना ही छोड़ दे भला जगत में आने का तुक और प्रयोजन क्या रहेगा?

इसलिए मौन मारना तभी होता है जब बोलने के लिए कुछ बचता नहीं है. नहीं तो हम तब तक बोलते हैं जब तक कि हमारा बोलना चुक नहीं जाता. हम बोलकर बहुत कुछ समझा देना चाहते हैं. वाकपटुता तो खैर एक विद्या ही बन गई है आजकल. चतुर सुजान की वाणी का भला क्या मोल? लेकिन मौन सिर्फ वाणी को विराम ही नहीं होता. मौन के तीन स्तर हैं.

अगर आप मौन का आनंद लेना चाहते हैं तो शुरूआत वाणी को विराम देने से नहीं करना चाहिए. शुरूआत होनी चाहिए शरीर के मौन से. यह शरीर का मौन क्या होता है? शरीर की स्थिरता शरीर का मौन है. अगर हमने अपने शरीर को स्थिर करने में सफलता पा ली तो मौन की शुरूआत हो जाती है. शरीर को स्थिर करने की कलाएं बहुत हैं. लेकिन जानिए कि मौन शुरू शरीर की स्थिरता से ही होता है.

फिर दूसरा नंबर आता है वाणी का. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जैसे ही शरीर स्थिर होता है वाणी अपने आप मौन हो जाती है. बिल्कुल ही न बोलने या फिर बहुत सूक्ष्म बोलने की इच्छा होती है. यह वाह्य शरीर की स्थिरता का सीधे तौर शरीर के भीतरी हिस्से पर असर है. इसलिए अपने को यह समझ में आया कि वाणी तभी वाचाल होती है जब मन चंचल होता है. चित्त अस्थिर होता है. लेकिन मन और चित्त को पकड़ना और उन्हें नियंत्रित करना बिल्कुल मुमकिन नहीं अगर हमने अपने शरीर को स्थिर नहीं किया.

देखो भाई, शरीर को भीतर से पकड़ने की बजाय बाहर से पकड़ना ज्यादा आसान होता है. इसलिए शरीर को जब हम बाहर से स्थिर करना शुरु करते हैं तो उसका असर शरीर के भीतरी हिस्सों पर होता है. इसलिए वाणी का मौन धारण करने के लिए शरीर की स्थिरता बहुत जरूरी लगती है.

आखिरी मौन है विचारों का मौन. अब विचारों की स्थिरता तो सब कहते हैं विचारों के मौन के बारे में कहीं सुना नहीं. लेकिन अपना अनुभव बोलता है कि शरीर की स्थिरता वाणी की स्थिरता देती है, प्राण को लयबद्ध करती है जिसके परिणाम स्वरूप विचार अपने आप स्थिर हो जाते हैं. तो तीसरी अवस्था का जो श्रेष्ठ मौन है वह पहली अवस्था के बिना प्रकट नहीं होगा. और जब विचार मौन धारण करेंगे तो उसका असर विपरीत क्रम में वाणी, और शरीर पर होगा.

अहा! मौन का क्या आनंद है.