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प्राण योग
अप्रैल 19, 2010

शरीर में पांच तरह के प्राण है. प्राण, समान, व्यान, उदान और अपान. अगर आप आयुर्वेद और तंत्र विद्या को नहीं जानते तो इस बात को समझने में थोड़ी मुश्किल होगी क्योंकि मेडिकल साइंस तो इसे कोरी बकवास कहकर खारिज कर देगा. लेकिन पंच प्राण का विज्ञान वर्तमान कलपुर्जा विज्ञान से अधिक शास्वत और सूक्ष्म है. हमारे शरीर के पांच प्राण अपने अपने अनुसार गति करते हैं और शरीर तथा मन की समस्य क्रियाओं को नियंत्रित और संचालित करते हैं.

पांच तरह के प्राण के बारे में मेरी पहली जानकारी उस वक्त आयी जब मैं वात के गंभीर रोग से ग्रस्त था. शरीर का एक हिस्सा मेरे नियंत्रण से बाहर जाता दिख रहा था. समझते देर नहीं लगी कि यह पक्षाघात का शुरूआती लक्षण है लेकिन मैंने इस बारे में किसी को बताया नहीं. मैंने तय किया कि यह शुरूआती अवस्था में हैं इसलिए इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है. उसी समय मैंने प्राण विद्या के बारे में जानना शुरू किया. आयुर्वेद में जो उपलब्ध ग्रन्थ मिल सके वे चिकित्सा विधि से प्राण को नियंत्रित करने की विधि बताते हैं. मैंने भी एक रस का प्रयोग किया और स्थिति नियंत्रण में आ गयी. लेकिन यहीं से प्राण विद्या में मेरी निजी रुचि बढ़ गयी.

साधना के दौरान कई तरह के प्रयोग चलते ही रहते हैं. आप कभी इस रास्ते पर कदम रखते हैं तो कभी उस रास्ते पर. कभी थोड़ा इधर तो कभी थोड़ा उधर. मेरा कोई गुरू नहीं है. जिन्हें मैं अपना गुरू मानता हूं उनसे कभी मिला नहीं. और अब तो वे शरीर में भी नहीं है. इसलिए भविष्य में साक्षात मिलने की संभावना भी नहीं है. फिर भी मैं उनसे मानस दीक्षा ले चुका हूं इसलिए अतीन्द्रीय मानस में गति चलती रहती है. प्राण विज्ञान को समझने के क्रम में ही प्राण योग का प्रकटीकरण हुआ. संसार में और लोग भी इस बारे में कुछ कहते बोलते जरूर होंगे लेकिन मैं जिस विद्या को उपलब्ध हुआ वह क्रिया और विचार का संगम है. इस विद्या में क्रियात्मक कार्य बहुत सीमित है. सिर्फ मानसिक रूप से अपने आप को उन्नत करके परम की ओर गति करनी है. कुछ सीधे सादे से सूत्र हैं और चरणबद्ध तरीके से उन्हीं सूत्रों का अभ्यास करना होता है. लेकिन हां, इन सूत्रों का अभ्यास विधि मैं अभी तक निश्चित नहीं कर पाया हूं इसे किसी पर लागू करना हो तो किस प्रकार से लागू किया जाए. वैसे सभी सूत्रों का अभ्यास करने की जरूरत भी नहीं है. एक सूत्र का अभ्यास भी अगर सध जाए जो अगला सूत्र अपने आप प्रकट हो जाएगा.

यह कोई कोर्स नहीं है कि आपको पढ़ा दें और परीक्षा ले लें. यह तो कुछ सूत्रों का समुच्चय है और उसको निरंतर अपने जीवन पर लागू करते रहना है. इस साधना में सबसे अच्छी बात यह दिखाई देती है कि इसमें शारीरिक अभ्यास चौथी अवस्था में आता है. यानी शुरूआती अभ्यास मानसिक ही हैं. मानो एक सूत्र पकड़ लिया और दिन में एक बार थोड़ा देर के लिए अभ्यास कर लिया. ऐसे ही कुछ दिन चलाते रहिए. चलाते रहिए. आंतरिक शुद्धि शुरू हो जाएगी. अपने ही द्वारा निर्मित किये गये चक्रव्यूह का भेदन शुरू हो जाएगा. और फिर तो अंदर जो उथल पुथल मचेगी कि दूसरे सूत्र का होश ही नहीं रहेगा. अगर कोई इमानदारी से अभ्यास करे तो पहला ही सूत्र आपके अंदर उथल पुथल मचा देगा. कोई टिका तो दूसरे सूत्र पर जाएगा, नहीं तो ऐसा भागेगा कि दोबारा लौटकर नहीं आयेगा प्राण साधना करने. फिर दूसरा सूत्र. उसके साथ भी ऐसी ही बात. फिर इसी तरह से क्रम चलेगा. जितने सूत्र उतने चक्र और कोई चक्र भेदन नहीं करना है. कोई आसन प्राणायाम नहीं करना है. मजेदार है. जो टिक जाएगा वह पार हो जाएगा. समय आने पर इस बारे में आगे की जानकारी जरूर देंगे.

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