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नाभि से अपने आप को कैसे उन्नत करें?
सितम्बर 4, 2009

जो लोग साधना मार्ग पर आते हैं उन्हें सिखाया जाता है कि आप स्वांस को नाभि से लेना और छोड़ना प्रारंभ करें. अब बड़ी मुश्किल यह है कि चिकित्सा विज्ञान कहता है कि फेफड़े से सांस लो और छोड़ो. चिकित्सा विज्ञान ही नहीं आसन प्राणायाम में भी फेफड़ों से स्वांस को लेना और छोड़ना सिखाया जाता है. (कुछ प्राणायम छोड़कर). फिर साधना मार्ग पर स्वांस को नाभि पर केन्द्रित करने का क्या तुक है?

नाभि समस्त जीवन चक्र का आधार है. ध्यान रखिए मैं जीवन नहीं बल्कि जीवन चक्र की बात कर रहा हूं. इसलिए साधना मार्ग पर जो साधक आते हैं उन्हें कहा जाता है कि वे नाभि चक्र पर अपने स्वांस को केन्द्रित करें. इसका गहरा अर्थ यह होता है कि जब शिक्षक आपको नाभि पर स्वांस को केन्द्रित करने के लिए कहता है तो वह आपको आपके जीवन चक्र के साथ जोड़ने की कला सिखाता है.

अब सवाल है कि नाभि चक्र तक स्वांस को ले कैसे जाएं? जो जितना उद्विग्न, गुस्सैल और चंचल होता है उसकी स्वांस उतनी ही नाभि के ऊपर चलती है. लेकिन जो जितना सहज, बोधयुक्त और शांत होता है उसकी स्वांस उतनी ही नाभि के पास से चलती है. यह क्रिया अपने आप होती है आपको कुछ करना नहीं होता है. जब आप शांत होतें हैं तो आपको अनुभव होता है कि आपकी स्वांस नाभि केन्द्र के आस पास से चल रही है. रात में आप सोते हैं तो स्वांस अपने आप नाभि केन्द्र से चलने लगती है. ऐसा क्यों होता है?

ऐसा इसलिए होता है कि आपके शरीर पर आपके तर्क और भौतिक विचारों का प्रभाव कम हो जाता है. हमारे अस्तित्व/हमारे मूल और हमारे बीच में जो सबसे बड़ी बाधा है वह भौतिक विचार ही हैं. हम जितने बनावटी होते हैं अपने अस्तित्व से उतने ही कटे हुए होते हैं. इसलिए आप अपने सामान्य जीवन में नैसर्गिक रहने की कला विकसित करिए. ज्यादा बनावटी जीवन जीने से बचिए. थोड़ा बहुत जीना भी पड़े तो सोने से पहले उस बोझ को उतार दीजिए. क्योंकि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो वह बनावटी जीवन धीरे धीरे आपको खोखला कर देगा.

इसलिए पहला काम तो यही कि बनावटी जीवन, बनावटी विचार, झूठे अहंकार इन सबसे तौबा करिए. इनका कोई मतलब नहीं है. आप को लगता है कि आप अपना स्तर उठा रहे हैं लेकिन हकीकत में आप अपने लिए ही संकट पैदा कर रहे हैं. इसलिए इनसे बचने की कोशिश करिए. इसका सीधा असर मन पर होगा जो आपके शरीर पर सकारात्मक रूप से दिखाई देने लगेगा.

दूसरा काम, जब कभी मन थोड़ा एकाग्र हो और आप आंख बंद करके कहीं बैठे हों तो अपनी नाभि पर अपने मन को ले जाइये. ऐसा करते हुए सिर से सब प्रकार के बोझ उतारते जाइये. यह दोनों क्रिया एकसाथ करिए. नाभि के करीब पहुंचते चले जाएंगे. विचारों के क्रम को हटाते जाइये और नाभि के आस पास मन को केन्द्रित करते जाइये. चार से छह महीने में अच्छी प्रगति होगी. धैर्य के साथ आगे बढ़ते जाइये.

तीसरा काम, थोड़ा और गहरी साधना में उतरे हुए लोगों के लिए जरूरी है कि श्वास को नाभि से सूक्ष्म होते हुए देखें. एक अवस्था ऐसी आयेगी कि स्वास गायब हो जाएगी. कोई स्पंदन नहीं होगा. नाभि पर भी कोई स्पंदन नहीं होगा. जब ऐसा होना शुरू हो तो प्रकाश को इड़ा-पिंगड़ा में संचरण करते हुए अनुभव कर सकेंगे. मूलाधार से सहस्रार तक शून्य का संचरण अनुभव होगा जिसके बाद ही ध्यान घटित होता है. जागृति होती है.

।।अलख निरंजन।।

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