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क्या श्वास से ध्यान होता है?
नवम्बर 11, 2008

स्वास से ही ध्या होता है. किसी भी पद्धति से आप ध्यान मार्ग में आईये आखिर में स्वास ही आधार बनती है. ध्यान के लिए स्वास को आधार बनाने के कई कारण हैं. बाहर भीतर के बीच स्वास ही सेतु है. बहुत सारे साधना विधियों में सिखाया जाता है कि आप मंत्र जप के साथ स्वास की लयबद्धता का ध्यान रखें. धीरे-धीरे मंत्र को स्वांस के साथ जोड़ दें. जैसे जैसे मन में गहरे उतरे मंत्र को छोड़ दें. मंत्र को छोड़ें क्या ऐसी अवस्था आती है जब मंत्र अपने आप छूट जाता है. मंत्र का आभामंडल शेष रहता है. एक उर्जा शक्ति आपको घेर लेती है. वह सकारात्मक उर्जा भी आपको सिर्फ स्वांस पर एकाग्र होने के लिए मदद करती है. इससे ज्यादा उस उर्जा शक्ति को पैदा करने का कोई प्रयोजन नहीं है.

मंत्र शब्दों का समुच्चय हैं जो लय और आभा पैदा करते हैं. मंत्र का जप इसलिए अनिवार्य कहा जाता है कि पहले तो आपके आस-पास सकारात्मक उर्जा का चक्र बने. क्योंकि वातावरण का बहुत असर होता है. आप जैसे वातावरण में रहते हैं वैसा ही आपका शरीर, मन और बुद्धि काम करती है. इसलिए ध्यान में जाने के लिए जरूरी है कि आपके आस-पास का वातावरण शुद्ध हो, सात्विक हो. मंत्र हमें दोनों तरह से मदद करते हैं. वे अंदर बाहर दोनों जगह शुद्धि करते हैं. यह कोई एक दो दिन का काम नहीं है. इसको जीवन के अभ्यास में लाना चाहिए. मंत्र जाप का यही उद्येश्य है. लेकिन यह ध्यान रखना है कि बाहर से जो मंत्र मिला है उसे छूटना है. लोग गलती क्या करते हैं कि मंत्र को ही पकड़कर बैठ जाते हैं. घण्टों जाप करते हैं और कहीं नहीं पहुंचते.

लेकिन इस आंतरिक वाह्य शुद्धि के लिए मंत्र एक मात्र उपाय नहीं है. कुछ लोग चित्त को शांत करने के लिए शारीरिक व्यायाम करते हैं. कुछ लोग और दूसरा कोई प्रयोजन कर लेते हैं. मूल बात तो यह है कि आंतरिक और वाह्य वातावरण कैसे सात्विक हो कि चित्त शांति के लिए ध्यान की शुरूआत की जा सके. विपश्यना साधना में भी कुछ शारीरिक अभ्यास कराये जाते हैं. मौन का अभ्यास कराया जाता है. अंदर शरीर में जो गतिविधियां चल रही हैं उनको जानने-परखने के उपाय सिखाये जाते हैं. मसलन आप कुछ देर के लिए अपने कानों को बंद कर लीजिए. आपके सिर में बहुत सारी खट-पट सुनाई देगी. ऐसा नहीं है कि वह अनोखा या नया है. वह चौबीसों घण्टे हो रही है लेकिन हम बाहर के शोर में इतने खोये हैं कि अंदर की हलचलों का हमें ख्याल ही नहीं है.

विपश्यना में स्वांस पर ध्यान देने की कला सिखाई जाती है. इस प्रक्रिया में किसी मंत्र आदि का जाप नहीं किया जाता. यहां तक कि सोहं का जाप भी नहीं होता जैसा कि हिमालयन यौगिक साधना पद्धति में सिखाया जाता है. विपश्यना में आपको सिर्फ अंदर आती जाती स्वांस पर अपना ध्यान टिकाकर रखना है. कहने में जितना आसान है पालन करने में उतना ही मुश्किल. लेकिन यही विपश्यना का मूल मंत्र है. यही समस्त साधनाओं का मूल मंत्र है. अगर साधना ठीक रही तो ऐसा वक्त भी आता है जब वाह्य स्वांस-प्रश्वास रूक जाती है लेकिन आप जीवित रहते हैं. स्वांस आंतरिक हो जाती है. स्वांस का केन्द्र कहीं और चला जाता है. तब आपको समझ में आता है कि स्थूल रूप से जो स्वांस-प्रश्वास हम कर रहे हैं उसके बिना भी हमारा अस्तित्व है. भौतिक जगत से परे भी मेरा अस्तित्व है. मेरे शरीर से भी परे मेरा अस्तित्व है. उस स्थिति का भान हो जाना ही ध्यान का लक्ष्य है जिसके बाद समाधि घटित होती है. कोशिश करिए, किसी न किसी दिन परिणाम अवश्य आयेगा.

हरीश ने यह सवाल पूछा था- I WANT TO KNOW ABOUT VIPPASANA DHAYANA KYA SANSON KO DEKHNE SE DHYAN HOTA HAI . SOME GURU TELLING THAT NO MANTRA WILL BE RECITE IN VIPASSANA  WHAT IS THE REALITY LET ME KNOW.

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