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अज्ञात का आनंद
अक्टूबर 6, 2008

कोई सात साल पहले की बात है. मैं हमेशा डरा-डरा सा अनुभव करता था. मैं बचपन से ही बहुत संवेदनशील था इसलिए छोटी-छोटी घटनाएं भी मेरे मन में बहुत गहरे बैठ जाया करती थीं. उस समय तो मैं उसे बाहर व्यक्त नहीं होने देता था लेकिन १२-१३ साल की उम्र से ही मुझे अनुभव होने लगा था कि मैं निरंतर एक भय में जीने लगा हूं. इसी उम्र से मेरे साथ कुछ अजीब घटना शुरू हो चुका था. अचानक मुझे लगता कि दुनिया शून्य है. कहीं किसी वस्तु और व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है. यह अनुभव इतना तीव्र होता था कि मैं लोगों के बीच रहते हुए भी लोगों के बीच नहीं रहता था. पूरा शरीर शून्य हो जाता. हल्का हो जाता. मानों शरीर भी नहीं है. कभी-कभी हांथ-पैर से पसीने भी आते. 

आज यह सब हो तो डाक्टर कहेगा कि तुम डिप्रेशन के शिकार हो. लेकिन उन दिनों मैं ये बातें किसी से बताता नहीं था. जो हो रहा है उसे चुपचाप अनुभव करता और बुद्धि काम नहीं करती तो जाकर सो जाता था. इसका दुष्परिणाम मेरे शरीर पर यह हुआ कि मुझे पेट के रोग हो गये. जिनसे मैं आज भी उबर नहीं पाया हूं. साथ साथ इन अनावश्यक विचार ऋंखलाओं ने मुझे अंदर से भयभीत रखना शुरू कर दिया. मुझे हमेशा यही डर लगा रहता कि कहीं फिर वही सब न शुरू हो जो पहले हो चुका था. एक तरह से मैं अपने आप से ही भाग रहा था. यहीं से मेरे मन में अज्ञात का भय बैठना शुरू हो गया. 

यह अज्ञात का भय इतना गहरा हो गया कि मेरी पूरी किशोरावस्था इस भय को सुपुर्द हो गयी. हर तरह से अपने आप से लड़ता रहा कि किसी तरह इससे बाहर आ जाऊं लेकिन मैं इससे बाहर नहीं आ सका. यह संचित भय आज से सात साल पहले भयंकर रोग के रूप में मेरे शरीर पर प्रकट हुआ. शरीर इतना जीर्ण हो गया कि दो कदम चला न जाए. शरीर ने भोजन लेने से मना कर दिया. एक निवाला खा नहीं सकता था, मानों कोई ताकत लगाकर सारा खाया हुआ भोजन बाहर फेंक रहा है. मैं तनाव के चरम पर जी रहा था. दो-तीन अस्पतालों के अलग-अलग डाक्टरों ने चेक किया लेकिन कहीं कोई रोग नहीं निकला. सब कुछ सामान्य था. डाक्टरों ने कहा कि मैं डिप्रेशन का शिकार हूं. मुझे एंजाईटी है. लेकिन इस गिरी अवस्था में भी मैं जानता था कि मैं अंदर से बहुत मजबूत हूं. मैं उनसे कहता था कि मेरा मन मैं ठीक कर लूंगा क्या आप शरीर को थोड़ा ठीक नहीं कर सकते कि मन को संभालने में मदद मिले? मेरी ये बातें उनको समझ में नहीं आती. 

मैं निराश हो गया. कोई छह महीने हर प्रकार का इलाज कराने के बाद भी मुझे कुछ खास आराम नहीं मिल रहा था. मैं तनाव और घबराहट के चरम पर जी रहा था. ऐसे ही दौर में एक दिन मैं हार गया. मन में जितनी भी इच्छाशक्ति बची थी वह सब जोड़कर मैंने मां से एक ही प्रार्थना की कि क्या मैंने ऐसा घोर पाप किया है जो तुम मुझे इतनी सजा दे रही हो. उस वक्त मेरा मन और आत्मा एक थे. वह सर्वशक्तिमयी मां जगदम्बा से मेरी बड़ी गहरी और सीधी प्रार्थना थी. मैं सचमुच उसके पैरों में था. मैंने कहा कि तुम उबार सकती हो तो उबारो नहीं तो मुझे इस शरीर से मुक्त करो. मैं यह पीड़ा और बर्दाश्त नहीं कर सकता. और मैं निढाल हो गया. गिर गया. सो गया. 

थोड़ी देर बाद उठा तो मैंने अपने अंदर बहुत बड़ा परिवर्तन महसूस किया. मुझे प्रत्यक्ष रूप से यह अनुभव हुआ कि मेरे जीवन का पारा जो लगातार गिर रहा था उसने अपनी दिशा बदल दी है. कोई पांच-सात मिनट के अंतराल में ही मैंने अनुभव किया कि मैं ठीक हो जाऊंगा. न जाने कहां से मेरे अंदर नये प्राण का संचार हो चुका था. मैं मौत से जीवन की तरफ लौट आया था. यहां से मेरे जीवन में एक क्रांतिकारी बदलाव आया. अब मैं अज्ञात के भय की बजाय अज्ञात के आनंद में जीने लगा था. अनिष्ट होने की जो मनोदशा थी वह बदल चुकी थी. अब लगने लगा था कि जो होगा वह अच्छा ही होगा भले ही वह हमें समझ में आये या न आये. 

जो अज्ञात है अगर हम उसे भय मानते हैं तो यह हमारे नकारात्मक बुद्धि की परिचायक है. हमारी बुद्धि सकारात्मक हो तो हम आनेवाले समय के प्रति सशंकित नहीं रहते. सकारात्मक बुद्धि हमें अज्ञात का आनंद देती है. वह जो परमसत्ता है, जो हमारी बुद्धि को संचालित कर रहा है वह जो कुछ करेगा वह शुभ ही होगा. क्योंकि उसमें अशुभ कुछ है ही नहीं. जिस दिन उस शुभ परमात्मा का हम ध्यान करते हैं उस दिन से हमारी बुद्धि सकारात्मक होने लगती है. हमारे मन का भय खत्म होने लगता है और हमें अज्ञात का आनंद प्राप्त होने लगता है.

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