धर्म सामाजिक व्यवस्था है

धर्म के बारे में यह बहुत भ्रम है कि यह कोई निजी या आत्मिक उन्नति का साधन है. भारत में धर्म सामाजिक व्यवस्था है. इसका निजी उन्नति या साधना से कुछ लेना-देना नहीं है. निजी उन्नति और साधना के लिए जो रास्ता है वह आध्यात्म का है धर्म का नहीं है.

इसलिए भारत में बहुदेववाद स्थापित सत्य है. क्योंकि समाज अगर हर दस कोस पर एक नया रूप ले लेता है तो ईश्वर को भी नया रूप लेना होगनया नाम धारण करना होगा. नये वस्त्र और आभूषण पहनने होंगे जो स्थानीय समाज से मिलते जुलते हों.अकेले कृष्ण के दर्जनों रूप हैं भारत में. केरल में कृष्ण कन्नन हो जाते हैं और वेषभूषा बदल जाती है तो पुरी में जगन्नाथ हो जाते हैं और वहां के हिसाब से अपना पहनावा बना लेते हैं. देवता की विविध रूपो में स्थापना का उद्येश्य यही है कि समाज अपनी सुविधा के हिसाब से अपने देवता चुने. ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि उसी देवता को आखिरकार पूरी रखवाली करनी है. सारी व्यवस्थाओं का अघोषित रूप से संचालन करना है. नदी के किनारे मंदिर में बैठकर. खेतों की मेड़ पर पिण्डी बनकर.

पेड़ के नीचे शिवलिंग और माता-भवानी बनकर. आखिराकर उसे ही सारी व्यवस्थाओं का अघोषित संरक्षण करना है. यह भावना इसलिए विकसित की गयी है क्योंकि धर्म समाज की व्यवस्था है. योगियों-महर्षियों ने बड़ी सूझ-बूझ से भारतीय भूमि में ऐसी प्रस्थापनाएं की हैं जिससे भारत की सामाजिक व्यवस्था अबाध गति से चलती रहे.

बहुत सारे लोग यह भ्रम फैलाते हैं कि हिन्दू धर्म भी वैसा ही कुछ है जैसे इस्लाम या ईसाईयत. यह गलत है.
हिन्दू कहीं है ही नहीं. हिन्दू राजनीतिक नामकरण और सौदेबाजी है. यहां सनातन धर्म की सत्ता है.
उसकी ही सारी व्यवस्थाएं है और पंथ के रूप में शैव, वैष्णव और शाक्त हैं. भारतीय सामाजिक व्यवस्था में हिन्दू कोई नहीं है. यह तो आधुनिक प्रतिक्रियावादियों के कारण सनातनी

अपने आप को हिन्दू कहने लगे हैं
नहीं तो इस देश का सभ्य प्राणी अपने आप को कभी हिन्दू नहीं कहता. हिन्दू शब्द हमारी ठीक पहचान कायम नहीं करा पाता.
इसीलिए आज भी मंदिरों में सनातन धर्म की जयकार होती है. हिन्दू धर्म की जयकार किसी मंदिर में नहीं होती.
क्योंकि हिन्दू नाम की कोई व्यवस्था है नहीं. जो है वह सनातन व्यवस्था है जो आधुनिकता और पुरातन के बीच एक कड़ी के
रूप में काम करती है.

भारतीय समाज की ताकत इसी सनातन व्यवस्था में टिकी है. जिसे दुनिया की कोई ताकत समझ ही नहीं सकती.
इसे समझने के लिए आपको
सनातनी होना पड़ेगा. फिर आप समझेंगे कि धर्म असल में सामाजिक व्यवस्था है और कुछ नहीं.

Advertisements

One Response

  1. कुछ लोग यह बातें ओशो के श्रीमुख से सुन चुके होंगे ……………. पर आश्चर्य की ब्लोगरों ने कोई टिप्पणी नहीं की इतनी महत्वपूर्ण पोस्ट पर

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: