हे राम, संतोष ही परम श्रेय है

श्री वशिष्ठ जी राम से कहते हैं –

परंतप राम, संतोष ही परम श्रेय है. संतोषयुक्त पुरूष (आत्मा) ही परम विश्राम को प्राप्त होता है. जो संतोषरूपी  ऐश्वर्य के सुख से संपन्न है तथा जिनका चित्त निरंतर विश्राम में रहता है ऐसे शांत पुरूष के लिए साम्राज्य भी तुच्छ लगता है. क्योंकि जिनके पास संतोष-धन है उनके लिए संसार का भोग विष सा जान पड़ता है. जो पुरूष अप्राप्त वस्तु की आकांक्षा न रखता हो और जो प्राप्त वस्तु में समभाव रखता हो. संतोष  से शीतल हुआ मन विशुद्ध विज्ञान की दृष्टि से अत्यंत विकास को प्राप्त होता है.

(सर्ग-14-15, मुमुक्षु प्रकरण)

व्याख्या :

भगवान राम यहां उसी तरह मोहग्रस्त और शंका में हैं जैसे श्रीकृष्ण के सामने अर्जुन. वशिष्ठ जी के सामने राम जी कई तरह के सवाल करते हैं. शरीर निंदा, बाल्यावस्था के दोष, युवावस्था के दोष, स्त्री शरीर के प्रति आकर्षण, वृद्धावस्था और दुखरूपता, काल के स्वरूप का विवेचन, काल का प्रभाव और मानवजीवन की अनित्यता, सांसारिक वस्तुओं की निस्सारता और अपने अंदर उठ रहे प्रबल वैराग्य की इच्छा.

इन सब प्रश्नों को विस्तार से सुनने के बाद राम को सुयोग्य पात्र माना. यह सब वैराग्य प्रकरण में आ जाता है. इसके बाद मुमुक्षु प्रकरण में वशिष्ठ जी राम के मन में उठ रहे प्रश्नों का विस्तार से उत्तर देते हैं. इस श्लोक में वशिष्ठ जी संतोष को सुख नहीं बल्कि श्रेय की संज्ञा दे रहे हैं. बिना इस भेद को समझे योगवशिष्ठ के इस श्लोक का अर्थ समझ पाना मुश्किल है. संतोष सुख नहीं है. यह सुख से आगे की अवस्था है. संतोष सच्चे अर्थों में श्रेय है. आप किसी का काम करें और वह आपको कोई प्रतिसाद न दे, फिर? क्रोध, तृष्णा, निंदा, यही सब. अगर आपको श्रेय दे देता है तो ? अपने होने का अहंकार, दानी-ध्यानी होने का गर्व, अच्छे होने का सुख. यह दोनों ही स्थितियां मनुष्य के चित्त को अशांत करती हैं.

संतोष श्रेय है. आपने कोई काम किया तो काम करने का संतोष ही आपका श्रेय है. उससे पैदा होनेवाले फल प्रतिफल के चक्कर में पड़े नहीं तो सत्यानाश पक्का. काम पीछे रह जाता है और काम करने का अहंकार सिर पर सवार. इससे आप अपने आप  को सुखी अनुभव कर सकते हैं लेकिन चित्त तो अस्थिर हो ही गया.

वशिष्ठ जी राम को इस दुविधा से बाहर निकाल रहे हैं. यही तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा- कर्म ही तुम्हारे अधिकार में है. फल क्या होगा यह तुम्हारे हाथ में है ही नहीं. जैसा कर्म वैसा फल. इसलिए बेहतर फल की इच्छा रखते हो तो कर्म अच्छा करो. कर्म के प्रति सावधान रहो, फल के प्रति नहीं. और अच्छे कर्म का परिणाम अच्छा ही होगा यह जरूरी नहीं. क्योंकि कर्मफल बनने में आपका प्रारब्ध भी आपके साथ चलता है. और वैसे भी कर्म से फल की इच्छा रखने पर कर्म बंधन बन जाता है. फिर उससे बाहर निकलने के लिए अलग से पूजा-पाठ.

मृत्युंञ्जय महादेवं त्राहिमाम शरणागतम्

जन्म-मृत्य जरा व्याधि पीड़ितं कर्म बन्धनै.

तो कर्म भी एक प्रकार का बंधन है. इसलिए मैंने कर्म किया उसको इमानदारी से किया. बस. इसके आगे उससे श्रेय-प्रेय की चिंता में क्यों पड़ते हो भाई? एक बात बता देते हैं. आप जो कुछ करते हैं आप सिर्फ माध्यम होते हैं. करनेवाला तो कोई और होता है. फिर श्रेय लेने की होड़ में क्यों पड़ते हैं? देनेवाले कोई और, करनेवाले कोई और, फिर अहंकार हम क्यों पाल लें.

जो भी इस अवस्था को प्राप्त होगा वह जानता है कि असली धन क्या है. संतोष क्या है. पहले तो क्षुद्र रूप से श्रेय लेने की होड़ से बाहर निकलना होगा.  कर्म को अपनी पहचान मत बनाईये. आपके काम में आप दिखने चाहिए. यह कर्म संन्यास की साधना है. इसके परिणामस्वरूप धीरे-धीरे चित्त निर्मल होगा फिर आपको समझ में आयेगा कि वशिष्ठ जी किस विशुद्ध विज्ञान की ओर संकेत कर रहे हैं. गोस्वामी जी ने भी श्रीरामचरितमानस में पहले ही कह दिया है – वंदे विशुद्ध विज्ञानौ, निर्मल चित्त विशुद्ध विज्ञान है. इसको कमतर करके आंकते हो और तन-मन के रोगी बने फिरते हो.

।। अलख निरंजन ।।  

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One Response

  1. बहुत सुन्दर ढंग से लिखा व समझाया है।बधाई।

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