निर्वाणाष्टकम्

मनो-बुध्दयहंकार-चित्तानिनाहं, न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।

न वै व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः, चिदानन्दरूपः शिवोहं शिवोहम्।।

न वै प्राणसंज्ञा न वै पंचवायुः, न वा सप्तधातुर्न वा पंचकोषः

न वाक्पाणि पादौ न चोपस्थ-पायुः, चिदानन्दरूपःशिवोहं शिवोहम्।।

न मे रागद्वेषौ, न मे लोभमोहौ, मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।

न धर्मों, न चार्थो न कामो न मोक्षः, चिदानन्दरूपःशिवोहं शिवोहम्।।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं, न मंत्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञाः।

अहं भोजनम् नैव भोज्यं न भोक्ता,चिदानन्दरूपः शिवोहं शिवोहम्।।

न मृत्युर्न शंका न मे जातिभेदः, पिता नैव मे नैव माता न जन्म।

न बन्धुर्न मित्रं गुरुनैव शिष्यः, चिदानन्दरूपः शिवोहं शिवोहम्।।

अहं निर्विकल्पो निराकार-रूपो, विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।

न चासंगतं नैव मुक्तिर्न बन्धःचिदानन्दरूपः शिवोहं शिवोहम्।।

।। अलख निरंजन ।।

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One Response

  1. महात्मन, मैं इस स्तोत्र को बहुत दिनो से खोज रहा था ! आपने इसे यहां पर देकर बहुत उपकार किया है ! मेरा परिवार इसे प्रति दिन प्रातः सुनता है ! अब आपकी कृपा से सोच्चारण सुनेगा ! शिवोहं शिवोहम्।

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