निर्वैरः सर्वभूतानाम्

ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः 

वैर करना आसान है. वैर न करना बहुत मुश्किल है. हम वैर-भाव कब रखते हैं? जब हमारा कोई नुकसान हो जाए या फिर हमारा कोई स्वार्थ पूरा न हो. ईर्श्या तो यहीं से पैदा होती है. कम अधिक सभी एक दूसरे से वैर-भाव रखते ही हैं. लेकिन एक बात बता देता हूं, ईर्श्या इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी है. जो भी ईर्श्या करता है वह अपना ही विकास रोक देता है.

आप जिससे वैर-भाव रखते हैं वह तो केवल माध्यम है. असल में तो आप अपने से ही वैर-भाव रख रहे हैं. ईर्श्या की अग्नी में वह नहीं आप खुद जलते हैं तो नुकसान उसका ज्यादा हुआ या आपका? आप अपनी बुद्धि का विश्लेषण करेंगे तो दंग रह जाएंगे. विचार चाहे जितने बदलते रहें काम एक समय एक ही कर सकते हैं. एकसाथ आप कई काम नहीं कर सकते. क्योंकि ऐसा करने के लिए हमने अपनी बुद्धि को प्रशिक्षित नहीं किया है. आप चाहें तो अपनी बुद्धि को इतना प्रशिक्षित कर दें कि एक समय में एकसाथ ही वह सहयोग भी करे और ईर्श्या भी. मुझे लगता नहीं कि कोई अपनी बुद्धि को इस तरह ट्रेनिंग देगा. बुद्धि का स्वभाव है कि वह एक समय में एक ही काम करती है. अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम उससे क्या काम लेना चाहते हैं.

आपको यह समझना होगा कि वहां दूसरा कोई नहीं है जिससे आप वैर-भाव रखते हैं. वह भी आप ही हैं. और जिससे आप वैर भाव रखते हैं वह मजे में है आप परेशान हैं. बेशक आप दुनिया को प्रेम मत करिए. बेशक आप प्रतियोगिता रखिये लेकिन वैर किसी से मत करिए. जिसे आप गलत समझ रहे हैं वह अपने कर्मों की सजा भुगत रहा है. उससे वैर करने की नहीं प्रेम करने की जरूरत है. कोई गुस्सा हो रहा है तो आप गुस्सा होकर उसकी बराबरी क्यों करते हैं. आग को आग से क्यों बुझाते हैं. गलत को गलत से क्यों सही करते हैं?

नमक से नमक नहीं खाया जाता. सुखी जीवन जीना है तो इस रहस्य को समझना होगा. नहीं तो जीवन आपका आप उसके मालिक. आपकी समझ और आपका सुख-दुख. कोई क्या कर सकता है?

जय सियाराम

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