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जीवन औषधि है – योगनिद्रा
जून 29, 2007

आज मैं यहां योगनिद्रा के बारे में संक्षिप्त परिचय दूंगा. जो लोग इस शब्द को पहले सुन चुके हैं वे जानते होंगे कि यह विद्या आसन के बाद और ध्यान से पहले धारणा के लिए बहुत सटीक है. असल में योगनिद्रा का उपयोग गहरे ध्यान में उतरने के लिए किया जा सकता है. जिनके लिए यह शब्द एकदम नया है, पहले उनको इसका थोड़ा परिचय.

योगनिद्रा तंत्र में वर्णित एक विधि है. इसके छुटपुट प्रयोग ध्यान के अभ्यास में होते हैं लेकिन समग्र रूप से योगनिद्रा को एक विधि के रूप में संगठित और प्रचारित किया परमहंस सत्यानंद सरस्वती ने. आज योगनिद्रा के रूप में जो विधि प्रयोग में लायी जाती है उसके मूल में स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा प्रतिपादित विधियां ही प्रचलित हैं. लोगों ने अपनी सुविधा के लिहाज से उसमें थोड़ा फेरबदल कर लिया है जिसमें कोई हर्ज नहीं है. आज सैकड़ों योगशिक्षक योगनिद्रा की शिक्षा दे रहे हैं. 

इसकी विधि शवासन की मुद्रा में पूर्ण करायी जाती है इसलिए कई लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि यह शवासन या फिर शिथलीकरण की ही कोई उन्नत विधि है. ऐसा है नहीं. योगनिद्रा का जो प्रतिपादन स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने किया है वह हमारे मन और शरीर को शिथलीकरण और शवासन से आगे ले जाता है. योगनिद्रा के प्रयोग से तनावजन्य बीमारियों, विक्षिप्तता, अवसाद, हृदयरोग सहित कई प्राणघातक बीमारियों में सफलता से प्रयोग हो रहा है. असल में बीमारियों के नाम भले ही बहुत हों लेकिन बीमारी एक ही होती है कि आप अस्वस्थ होते हैं. इस अस्वस्थता का कोई कारण होता है जो लंबे समय में पैदा होता है. अगर उस कारण तक सटीकता से पहुंचा जा सके तो इलाज करने में ज्यादा समय नहीं लगता.

आज के कलपुर्जों वाले स्वास्थ विज्ञान में मन की बात तब आती है जब मशीने जवाब दें दें कि आपका रोग नहीं नाप सकते. तब डॉक्टर लोग कह देते हैं कि वैसे तो शरीर में कोई रोग नहीं है इनको मन का रोग है. यानि शरीर हुआ पहले, मन हुआ बाद में. इस मामले में होम्योपैथी ज्यादा विकसित सिद्धांत है जहां मन और स्वभाव के लक्षणों से रोग को पकड़ते हैं और उसका इलाज करते हैं. इसलिए होम्योपैथी के बारे में कहावत है कि यह पैथी रोग को जड़ से खत्म करती है. आधुनिक विज्ञान ने इधर इतना जरूर किया है कि किसी गंभीर दुर्घटना आदि के केस में वे मनोवैज्ञानिक की भी मदद लेते हैं जिससे कि शरीर के साथ-साथ मन के घाव को भी भरा जा सके.

योगनिद्रा का चिकत्सकीय पहलू जो है उसका अपना महत्व है लेकिन इसका उद्येश्य वृहत्तर है. योगनिद्रा में धारणा के माध्यम से कर्म और प्रारब्ध  को संतुलित किया जा सकता है. बहुत कम लोगों को इस बात का अंदेशा रहता है कि उनके जीवन में जो कुछ घटित हो रहा है उसके रचनाकार वे खुद हैं. अगर उन्हें कोई रोग है दुर्घटना आदि की बात छोड़ दें तो हम अपने रोगों के भी रचनाकार हैं. हमारी जीवनशैली, सोच-विचार, आचरण इन सबका हमारे शरीर और मन पर असर पड़ता है. अब जैसा जीवन वैसा भविष्य. सीधी सी बात है. बोया पेड़ बबूल का आम कहां से खाय. इसलिए आम खाना है तो आम का ही पेड़ लगाना पड़ेगा. स्वस्थ रहना है तो स्वस्थ आचरण करना होगा.

हम लोग शरीर की स्वच्छता का जितना ध्यान देते हैं उसका आधा भी मन की स्वच्छता पर नहीं देते. मन मैला तन ऊजला… यह सबकी कहानी है. हमें लगता ही नहीं कि तन की स्वच्छता बाद में आती है पहले मन की स्वच्छता जरूरी है. शरीर धोये जाते हैं. अब तो आधुनिकता का जमाना है. इसलिए शरीर के लिए खूब साबुन-तेल बाजार में मिलते हैं. लेकिन मन की मैल कैसे साफ हो? उसका साबुन-तेल कोई नहीं बेचता. वह साबुन तेल पैसे से मिल भी नहीं सकता. जो पैसा लेकर योग सिखाते हैं, पूजा-पाठ कराते हैं उससे आपका कोई भला नहीं होनेवाला. उसके कुछ फायदे शरीर को हो जाएं तो अलग बात मन को कोई फायदा नहीं होता. मन का साबुन-तेल खरीदने के लिए श्रद्धा-विश्वास की पूंजी खर्च करनी पडेगी. नहीं है तो पहले श्रद्धा-विश्वास की पूंजी कमानी पड़ेगी. वैसे ही जैसे शरीर के लिए आभूषण खरीदना हो तो हम दिन-रात मेहनत करते हैं कि नहीं? कौड़ी-कौड़ी जोड़कर फिर दुकानदार को दे आते हैं. ऐसे ही मन का आभूषण खरीदना है तो पहले श्रद्धा विश्वास की पूंजी जोड़ो. और यहां तो कमाल है. आपको किसी दुकानदार के पास नहीं जाना है. दुकानदार खुद दरवाजे पर हाजिर. लो जी हो गया काम. 

तो श्रद्धा-विश्वास के बिना काम नहीं चलेगा. योगनिद्रा आपको अपने जीवन को नये सिरे से समझनें में मदद करता है. जीवन जो है, जैसा है की बजाय हम मनुष्य देह में क्यों आये हैं, क्या हमने वह काम कर लिया जिसके लिए मुझे यह देह मिली थी, योगनिद्रा आपके जीवन को ऐसे प्रश्नों से ही नहीं भरती वह इन प्रश्नों का उत्तर भी आपको देती है.

।।अलख निरंजन।।