श्री वशिष्ठ जी राम से कहते हैं -
परंतप राम, संतोष ही परम श्रेय है. संतोषयुक्त पुरूष (आत्मा) ही परम विश्राम को प्राप्त होता है. जो संतोषरूपी ऐश्वर्य के सुख से संपन्न है तथा जिनका चित्त निरंतर विश्राम में रहता है ऐसे शांत पुरूष के लिए साम्राज्य भी तुच्छ लगता है. क्योंकि जिनके पास संतोष-धन है उनके [...]