कर्म संस्कार, कुल संस्कार और जाति संस्कार

देखो भाई. तुम मानो या ना मानो. ये तीन संस्कार तो समझ में आ रहे हैं. हमारे शरीर और मन के साथ ये तीन तरह के संस्कार हमेशा जुड़े रहते हैं. कर्म का संस्कार, कुल का संस्कार और जाति का संस्कार. कहीं भी चले जाओ ये तीन संस्कार तो साथ ही रहेंगे. बनने के लिए कुछ भी बन जाओ लेकिन इन तीन संस्कारों से मुक्ति मुश्किल है. कर्म संस्कार को बदलने की कोशिश तो तुम अक्सर करते ही रहते हो, लेकिन कुल संस्कार और जाति संस्कार का क्या करोगे? इनका असर तो जीवन पर रहेगा. अगर इन तीन प्रकार के संस्कार को समझ कर तुम व्यवहार करोगे तो जीवन जीने में बड़ी आसानी हो जाएगी.

सबसे पहले है तुम्हारा अपना संस्कार. उसे कर्म का संस्कार मानना. तुम्हारे द्वारा किया गया कर्म घनीभूत होकर तुम्हारा प्रारब्ध बनता है और वही प्रारब्ध तुम्हारे साथ साथ चलता है. किसी भी योनि में जन्म ले लो कर्म के संस्कार जुड़े ही रहते हैं. मनुष्य योनि में आ गये तो वे संस्कार मुखर हो जाते हैं. दूसरी योनियो में वह अभिव्यक्ति भले ही न हो लेकिन संस्कार तो साथ रहते ही हैं. और जब पशुओं की बात कर रहा हूं तो ज्यादा तर्क बुद्धि का इस्तेमाल मत करना. जीव जीव होता है. उसके ओढ़े गये शरीर से उसकी महत्ता कम नहीं होती. किसी भी योनि में भटक रहा जीव उतना ही महत्वपूर्ण है जितना मनुष्य योनि में आकर स्थिर हुआ जीव. इसलिए ऐसा मत समझना कि दूसरी योनि के जीव तुमसे कोई हेठ हैं. वे श्रेष्ठ न सही लेकिन हेठ भी नहीं है.

तो कर्म के संस्कार तुम्हारे साथ चल रहे हैं. नित्य प्रति के किये गये कर्म ही लंबे अभ्यास में स्वभाव बन जाते हैं. स्वभाव जब स्थाई और सूक्ष्म हो जाता है तो वह संस्कार बन जाता है. यही सूक्ष्म संस्कार तुम्हारा शरीर छूटने के बाद साथ जाता है. यह सूक्ष्म संस्कार जीव के साथ स्थाई रूप से जुड़ता है तो प्रारब्ध बन जाता है. और अगली दफा जब तुम कोई भी शरीर पाते हो तो वही संचित प्रारब्ध तुम्हारे कर्मों को निर्धारित करते हैं. यह एक पूरी परिधि है. कर्म का वर्तुल है. एक जीवन विविध योनि में न जाने क्या क्या कर्म करता है. वह सब उसके घनीभूत संस्कार बनते चले जाते हैं. उसी से तुम्हारा व्यवहार निर्धारित होता है. इसलिए कर्म काटना हो तो प्रारब्ध भुगतना होता है. आज का कर्म आनेवाले कल का प्रारब्ध है. तो कर्म बंधन काटने चलोगे तो सारे सत्कर्म करने के बाद भी दुख ही मिलनेवाला है. इसके लिए तैयार रहना. रोना मत कि मैं तो बहुत अच्छे कर्म कर रहा हूं फिर कष्ट क्यों भुगत रहा हूं. याद रखना, हिसाब किताब हो रहा है. कष्ट कम से कम होगा. इसलिए कर्म का संस्कार काटना ही पड़ता है. अगर हम मुक्ति मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं तो कर्म के संस्कार काटने पड़ते हैं. न भी मुक्ति की इच्छा हो कर्म के संस्कार हमारे व्यवहार का निर्धारण करते हैं.

इसके बाद हमारे व्यवहार के निर्धारण में कुल के संस्कार का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है. किसी न किसी युति के बिना हमारा अस्तित्व में आना संभव नहीं है. वे जो दो नर मादा युति कर रहे हैं, उससे जो संतति निर्मित होती है उस पर उस युति के कर्मों का असर रहता है. तुम्हारे अपने संस्कार तो साथ हैं ही, तुम्हारे होने में तुम्हारे होने में तुम्हारे मां बाप के कर्म भी संचित होता है. उनके होने में उनके कुल का कर्म संचित रहता है. ये जो तुम लोग जाति कुल गोत्र को गालियां देते हो, यह तुम्हारी मूर्खता है. वास्तविकता तो यही है. अभी जानते नहीं है इसलिए मिथक है. जिस दिन जान जाएंगे वह तुम्हारा विज्ञान हो जाएगा. तो कुल का संस्कार साथ चलता है.

इसके बाद कुल का ही विस्तार जाति है. कुल विशुद्ध रूप से पारिवारिक व्यवस्था है जबकि जाति सामाजिक व्यवस्था है. जो वर्ण व्यवस्था है, जाति व्यवस्था उसी का अपभ्रंस है. थोड़ा और सरल स्वरूप. जब तुम्हारा जन्म होता है तो तुम्हारा पालन पोषण जिस माहौल में होता है, उससे जो तुम्हारा संस्कार निर्मित होता है, वह तुम्हारा जाति संस्कार है. फिर बड़े होने पर तुम्हारे अधिकांश व्यवहार एक खास समुदाय के बीच ही संपादित होता है. इसलिए उस समुदाय के या जाति के संस्कार से तुम मुक्त नहीं हो सकते.

इसलिए जीवन में सिर्फ अपने कर्म संस्कार के प्रति ही सचेत मत रहना. तुम्हारा कुल संस्कार और जाति संस्कार भी तुम्हारे व्यवहार का निर्धारण कर रहा है. इतना ध्यान रखोगे तो सामाजिक व्यवहार और जीवन व्यापार करते समय तनाव और विरोधाभास बहुत कम हो जाएगा.

हरि ऊॅ तत् सत्

One Response

  1. Bahut hi sunder vichar hai. sabhi ke janane yogya. apko satsat pranam.
    n.k.dwivedi

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