अनुभूति का परा विज्ञान
चेतना के तीन तल हैं. स्थूल, सूक्ष्म और शून्य. स्थूल जगत की चेतना क्या है यह किसी को भी बताने की जरूरत नहीं है. हम सब उससे दो-चार हैं. हमारी इंद्रियों के द्वारा जो भी व्यवहार होता है वह स्थूल चेतना का परिणाम है.
सूक्ष्म चेतना मानसिक है. प्राणिक है. यह स्थूल चेतना को संचालित करती है लेकिन उस पर निर्भर नहीं है. सूक्ष्म चेतना एक तरह का ट्रांसफार्मर है
जो उर्जा को ग्रहण कर इंद्रियों को संचालित करती है.
चेतना का तीसरा तल शून्य है. पार्टिकल्स का वह स्थिर बिन्दु जो परम गति में स्थिर है. मानो घूमते पहिये की धुरी का आखिरी बिंदु. वह स्थिर है.
पूरा पहिया घूम रहा है लेकिन वह आखिरी परमाणु स्थिर है जिसकी परिधि में पूरा पहिया घूम रहा है. यह चेतना की ब्रह्म अवस्था है. यहां तक आने
के बाद आप दो नहीं रह जाते. आप कर्ता नहीं रह जाते और कर्म भी नहीं करते. क्योंकि कार्य कर्ता और कर्म तीनों आप ही हैं.
स्थूल जगत की चेतना को समझने और विश्लेषण करने के लिए अपरा विज्ञान की जरूरत होती है.
सूक्ष्म जगत का विज्ञान समझने के लिए परा विज्ञान की जरूरत होती है.
शून्य को समझने के लिए अपरा और परा दोनों विज्ञान को त्यागना पड़ता है.
लेकिन ये तीन अवस्थाएं कोई अलग अलग नहीं है. यह एक क्रम की तरह है. अपरा विज्ञान समझ में नहीं आया तो परा कभी समझ में नहीं आयेगा.
अपरा या भौतिक विज्ञान ही रास्ता खोलता है. आज की दुनिया का संकट यह है कि लोग भौतिक विज्ञान में उलझ गये हैं. वह जो रास्ता बता
रहा है
उसके आगे हम जाना नहीं चाहते.
भौतिक विज्ञान को समझने के लिए अपरा बुद्धि या भौतिक बुद्धि चाहिए. लेकिन उससे आगे एक कदम भी चलना हो तो श्रद्धा और विश्वास के
परा विज्ञान की जरूरत होती है. इसलिए श्रद्धा और विश्वास परा विज्ञान हैं. जिसे यह समझ में आता है वही पूर्णता को प्राप्त कर सकता है.
अन्यथा तो अपरा विज्ञान उलझाए ही रखता है और लोग खाली ही चले जाते हैं.
।। अलख निरंजन ।।