धर्म के बारे में यह बहुत भ्रम है कि यह कोई निजी या आत्मिक उन्नति का साधन है. भारत में धर्म सामाजिक व्यवस्था है. इसका निजी उन्नति या साधना से कुछ लेना-देना नहीं है. निजी उन्नति और साधना के लिए जो रास्ता है वह आध्यात्म का है धर्म का नहीं है.
इसलिए भारत में बहुदेववाद स्थापित सत्य है. क्योंकि समाज अगर हर दस कोस पर एक नया रूप ले लेता है तो ईश्वर को भी नया रूप लेना होगनया नाम धारण करना होगा. नये वस्त्र और आभूषण पहनने होंगे जो स्थानीय समाज से मिलते जुलते हों.अकेले कृष्ण के दर्जनों रूप हैं भारत में. केरल में कृष्ण कन्नन हो जाते हैं और वेषभूषा बदल जाती है तो पुरी में जगन्नाथ हो जाते हैं और वहां के हिसाब से अपना पहनावा बना लेते हैं. देवता की विविध रूपो में स्थापना का उद्येश्य यही है कि समाज अपनी सुविधा के हिसाब से अपने देवता चुने. ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि उसी देवता को आखिरकार पूरी रखवाली करनी है. [...]