ए सेल्फिस माइंड

बहुत सोचा कि इसका हिन्दी अनुवाद क्या करूं? लेकिन सटीकता से कोई शब्द समझ में आया नहीं. स्वार्थ बुद्धि कह सकते हैं लेकिन सेल्फिस माइंड स्वार्थ बुद्धि से भी जटिल और हानिकारक है. हमेशा अपने बारे में ही सोचना सेल्फिश माईंड की पहली निशानी है.

सेल्फिश माईंड वाले लोगों की एक खास जीवनशैली होती है. वे पाने में विश्वास रखते हैं. देना उनके स्वभाव का हिस्सा नहीं होता. उन्हें सिर्फ अपने शरीर की चिंता होती है. अपने सुख की चिंता होती है. अपने सुख के लिए ऐसे लोग किसी को भी दुख में डाल सकते हैं. लेकिन एक बात बताता हूं. ऐसे लोग कभी सुखी नहीं रहते. हमेशा परेशानियों में घिरे रहते हैं. जितना आप दूसरों के लिए परेशानी खड़ी करते हैं खुद उसी अनुपात में आप परेशानियों में घिरते चले जाते हैं.

मैं देख रहा हूं योगा करनेवाले अधिकांश लोग इसी श्रेणी के लोग हैं. सुबह सवेरे भागे जा रहे हैं, और स्वस्थ्य होते ही और सारे दुष्कर्म करने की योजनाएं बनाते रहते हैं. अपने शरीर के लिए योगा करेंगे, मार्निंग वाक करेंगे, मंदिर जाएंगे. आप जो कह दीजिए वे सबकुछ करने को तैयार रहेंगे. लेकिन सतगुण से फिर भी दूर ही रहेंगे.  इसलिए इतना सब करने के बाद भी मन और शरीर से रोगी के रोगी रहते हैं.

निरोग होना है तो इसकी शुरूआत मन से करनी होगी. मन के विचारों को शुद्ध करना होगा. बुद्धि को पवित्र करना होगा. भावनाओं को पवित्र करना होगा. अगर तुम्हारी बुद्धि परोपकारी है, मन निश्चल है और भावनाएं शुद्ध हैं तो एक बात नोट कर लेना तुम्हें शरीर का कोई हार्ट अटैक नहीं आयेगा, कभी डाईबिटीज नहीं होगा, तुम्हारा सुगर लेबल ठीक रहेगा. ये सारे रोग दूषित विचारों से पैदा होते हैं. तुम्हें इसका गणित समझ में नहीं आयेगा लेकिन यही सच है.

किसी दिन दिनभर केवल गरीबों को भोजन करवाना. देखना तुम्हारे शरीर पर क्या प्रभाव होता है. किसी दिन किसी अभावग्रस्त की थोड़ी मदद कर देना देखना तुम्हारे शरीर और मन पर कैसा प्रभाव होता है. उस दिन अपना शुगर भी चेक करवा लेना और दिनों के मुकाबले बहुत कम निकलेगा. 

पहले बुद्धि को उदार बनाओ. बुद्धि की इस तरह से ट्रेनिंग करो कि उनके भले के बारे में भी सोचना शुरू करे जिनसे प्रत्यक्ष तुम्हारा कोई नाता नहीं है. ध्यान रखना हम सब जुड़े हुए है. यह तो संकुचित बुद्धि का प्रभाव है कि यह जुड़ाव समझ में नहीं आता नहीं तो कोई भी अलग नहीं है. तो बुद्धि की ट्रेनिंग शुरू करो.  उसको अभ्यास करवाना शुरू करो कि अस्तित्व में जो कुछ है वह सब हमसे जुड़ा हुआ है. इसे कहते हैं चेतना का विकास. अपनी चेतना के दायरे को मन के मंडल से दूर ले जाओ. मन तो केवल चेतना का शोषण ही करता है. उटपटांग बातों का चिंतन और फिर उन्हें पूरा करने के प्रयास में  ही हमारी चेतना का अधिकांश हिस्सा नष्ट हो जाता है.

 अपने-आप को इससे बाहर निकालो. दूसरों के साथ अपने जुड़ाव का अनुभव शुरू करो. तुम जुड़े हुए हो लेकिन अनुभव नहीं करते. बस तुम्हारा काम है वह अनुभव शुरू कर दो. देखना क्या कमाल होता है. तुम्हे तनाव मैनेज करने की जरूरत कभी महसूस ही नहीं होगी. क्योंकि तनाव और क्रोध पैदा होता है सैल्फिस माईंड के कारण. एक बार तुम उदार बनना शुरू कर दोगे तो तुम्हारी सारी परेशानियां अपने-आप दूर हो जाएंगी.

4 Responses

  1. बहुत बढ़िया लेख आभार

  2. गजब। सुंदर लेख।

  3. a selfish mind lekh me kahi gayi bato se swanubhoot vicharo ki pusti hui hai.kintu, mai apane swam ke anubhav ke adhaar par itana awasy kahun gaa ki aaj ke samaj me bahusankhyk log aise hai joki aap ke bhawatmk lagav ka fayda uthate hai ya uthana chahate hai.isase bachane ka mere pas koi upaay nahi hai.aisa kya karu ki mai apane ko thagaa saa mahasus na karu?

    • इसका उपाय तो मेरे पास भी नहीं है. यह तो संसार की अनिवार्य अवस्थाएं हैं जो हमेशा रहेंगी. आपकी काबिलियत इसी में होगी कि आप जो हैं वह बने रहें. यही कोशिश मैं भी करता हूं. मैं जो हूं अगर वहा बना रहता हूं तो धीरे धीरे लोग मुझे मेरे रूप में ही स्वीकार करने लगते हैं.

      भावुक होने के साथ साथ तटस्थ बनिए. मदद मिलेगी.

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