यह कहना मुश्किल है कि संन्यास पा लिया है. संन्यास के लिए मन का तैयार हो जाना और मन का उत्सुक रहना दोनों दो अलग-अलग बाते हैं. संन्यास के लिए मन में उत्सुकता बहुतों के आती है लेकिन उसका परावर्तन संन्यास में हो जाए, यह बहुत मुश्किल बात है. असल में वास्तविक संन्यास किसी को मिलता भी नहीं है. सदियों में कोई एक दो लोग ऐसे आते हैं जो वास्तविक संन्यासी होते हैं और उन्हें हम जान पाते हैं. देश में 70 लाख से भी ज्यादा साधु-संत हैं उनमें संन्यासी कितने हैं, कहना मुश्किल है.
संन्यास का सामान्य मतलब समझा जाता है-त्याग. जो संसार की सुख-सुविधा को त्याग कर दे, संसार से अनासक्त हो जाए और निरंतर परम सत्ता के प्रति सचेत रहे वह संन्यासी हुआ. सबसे पहली बात संसार को भौतिक रूप से त्याग नहीं किया जा सकता. शरीर है तो शरीर की मर्यादाएं भी हैं. इसको भोजन चाहिए, पानी चाहिए, निद्रा चाहिए, मैथुन की प्रवृत्ति बनेगी ही. कोई इनसे दूर नहीं हो सकता. और यह सब जरूरी है तो इनको जुटाने के उपाय करने ही पड़ेंगे. इस जुटाने के क्रम में आपको भय का सामना करना ही पड़ेगा. जहां भय हैं वहां संन्यास नहीं हो सकता.
संन्यास की हमारी समझ में खोट आ गया है. हम जिसे संन्यास के रूप में परिभाषित करते हैं वह ढोंग-ढकोसले वाला सिद्धांत है. समाज के भय से संन्यासियों ने ऐसी परिभाषाएं गढ़ लीं कि सामान्य व्यक्ति को वह समझ में ही न आये. बहुत से लोग अपने आप को संन्यासी कहते हैं और एक-एक रूपये के लिए दरवाजे-दरवाजे भटकते रहते हैं. अखाड़ों में आज भी संन्यास जिन्दा है और संन्यास को समझने के लिए शंकराचार्य की अखाड़ा व्यवस्था को समझना होगा. संन्यास का वास्तविक मतलब है न राग न त्याग.
सच्चा संन्यासी आसक्त नहीं होता लेकिन वह यह भी नहीं कहता कि वह विरक्त हो गया है. कई बार तो परिभाषाओं के अनुकूल व्यवहार करने के लिए संन्यासी छद्म व्यवहार करते हैं. कुछ ऐसे तांत्रिक प्रयोग हैं जिन्हे करने से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपनी क्षमता और प्रभाव दिखाने के लिए उन तांत्रिक प्रयोगों का प्रदर्शन करें. एक बात का उल्लेख करता हूं. संन्यासियों में धूनी रमाना यानि अलाव जलाकर उसके किनारे समय गुजारना. अखाड़ों में यह सामान्य दिनचर्या का हिस्सा है. लेकिन है यह एक तांत्रिक प्रयोग. अग्नि समस्त प्रकार के अपशिष्ट का नाशक और उर्जा का स्रोत है. एक संन्यासी लगातार इसके संपर्क में रहता है तो केवल उसका शरीर ही नहीं मन भी पवित्र होता है. यह प्रयोग सामान्य लोग भी कर सकते हैं. शरीर में अग्नि के प्रमुख केन्द्र को प्रज्वलित कर दिया जाए तो शरीर के सारे रोगों का शमन हो जाता है. योग और प्राणायाम में शरीर की अग्नि को प्रज्वलित किया जात है औऱ पांच प्राणवायु की गति सम्यक की जाती है. इसका प्रभाव होता है कि शरीर से सारे रोग दूर हो जाते हैं. लेकिन धूनी रमाने को समाज में ऐसे परिभाषित कर दिया गया है मानों खाली समय काम है और ऐसा करना केवल एक कर्मकाण्ड है. जो धूनी का मुहत्व समझेगा वही यज्ञ का महत्व समझ सकेगा.
अब साधू लोगों को भी इसमें मजा आता है. उनमें से बहुतों को इसका मतलब भले ही न पता हो लेकिन वे इस नियम का पालन तो करते ही हैं. भारत की परंपरा में संन्यास को लेकर भ्रम बहुत है. कुछ साधू लोगों की कृपा है कुछ समाज की मेहरबानी. कम से कम आप लोग उस भ्रम को मत पालिए. संन्यास का एक मतलब होता है - दाता. जो सदैव दूसरों को देने के लिए चिंतित रहता है वह सच्चा संन्यासी है. जो समाज से जितना पाता है, उससे कई गुना अधिक लौटाने को उद्यत रहता है, वह है संन्यासी.
हरि ऊँ तत् सत्
बहुत अच्छा!
मेरे तो रोल मॉडल राजा जनक हैं. और आपने भय की बात की – मेरे विचार से भय ही नहीं गीता के 16 वें चैप्टर की सभी दैवी-आसुरी वृत्तियों पर लिखा जा सकता है – बहुत प्रेरक अध्याय है वह!
भैया ऐसा लिखते रहें.
अलख निरंजन, मान्यवर और लिखें, कुछ उपाय सुझाएँ जिनसे लोगों का कष्ट दूर हो…
koi.bhi.bichar.antim,satya,ko,nahi.day,sakta.,bichar,kabhi.bhi.antim,satya,ho,nahi,sakta,,sarey,kay.sarey.murda.achhar,aur,kitabay,kewal.bicharo.ka.falaw.hai,challange,,,,,,,,,mishra